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ममता ने बंगाल के साथ जीता नदीग्राम का संग्राम,असम में कमल खिला,केरल में लाल सलाम

कोलकाता(व्हीएसआरएस न्यूज) पश्चिम बंगाल में हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती जारी है। ममता की पार्टी को 212 सीटें मिली है। जबकि 78 सीट पर भाजपा सिमट गई है। पूरा परिणाम अभी आया नहीं। लेकिन ममता ने लगातार तीसरी बार बंगाल जीतकर हैट्रिक रचते हुए डबल शतक लगा दी है। इस विधानसभा चुनाव में बंगाल की सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल सीट नंदीग्राम रही,यहां मतों की गिनती संपन्न हो चुकी है। इस सीट पर मुकाबला मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और हाल ही में भगवा झंडा थामने वाली बीजेपी प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी के बीच रहा।

शुरु के की कई राउंड में पिछड़ने के बाद ममता बनर्जी को अंतिम के कुछ चरणों में बढ़त बनाने में सफलता मिली। दोनों के बीच मुकाबला काफी दिलचस्प हो चुका था। कभी ममता आगे हो रही थीं तो कभी शुभेंदु अधिकारी बढ़त बना ले रहे थे। आखिर में जीत ममता बनर्जी की ही हुई्। उन्होंने अंतिम राउंड की गिनती संपन्न होने के बाद करीब 1200 मतों से जीत दर्ज की।
तमिलनाडु में 153 सीट जीतकर डीएमके कांग्रेस गठबंधन सरकार बना रही ह,जबकि जयललिता की पार्टी एआयडीएमके को 9ढ़80 सीटें मिली है। को तो केरल में 100 सीट जीतकर लेफ्ट ने फिर लाल सलाम का झंडा फहराया।विरोधी पार्टी एलडीएफ को 40 सीटें मिली। पुडुेचेरी में एनडीए को 9 और यूपीए को 3 सीटें मिली है। केवल असम में भाजपा की सत्ता आयी है। यहां एनडीए 73 और यूपीए 50 सीटें जीत की ओर है। पांच राज्यों में सबसे ज्यादा फोकस भाजपा ने पश्‍चिम बंगाल में की थी। लेकिन वहां बुरी तरह हार का सामना करना पडा। भाजपा दो आंकडों में सीमट गई।

ओवैसी चारों खाने चित्ता- बिहार के रास्ते बंगाल में सियासी रास्ते तलाशने उतरे ओवैसी चारों खाने चित्त हो गए। बंगाल में असली खेला हो गया और एवैसी की पार्टी एआइएमआइएम के सातों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र से चुनाव लड रहे थे। मुसलमानों ने ममता पर भरोसा जताया और ओवैसी को नजरअंदाज कर दिया।

बंगाल में भाजपा के हारने के 7 बडे कारण-

1) कोरोना वायरस : देश और पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस के तेजी से बढ़ते मामलों ने भाजपा के चुनावी
अभियान पर बुरा असर डाला। आखिरी के 4 चरणों पार्टी का चुनाव अभियान बिखरा-सा नजर आया। एक और
भाजपा के बड़े बड़े चुनावी वादे थे तो दूसरी और मतदाता मूकदर्शक बने राज्य में बढ़ रहे कोरोना के कहर को देख रहे थे। बड़ी संख्या में बाहर से आए नेता और कार्यकर्ता लोगों की चिंता बढ़ा रहे थे। तृणमूल कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टी होने का फायदा मिला।
2) ममता की टक्कर का नेता नहीं : भाजपा को पश्चिम बंगाल में ममता की टक्कर के नेता की कमी जमकर
खली। पार्टी ने पीएम मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। बहरहाल बंगाल की जनता को पता था
कि ना तो मोदी और ना शाह राज्य के सीएम पद को संभालेंगे। दिलीप घोष से लेकर शुभेंदु अधिकारी तक सभी पर ममता की लोकप्रियता भारी पड़ी।
3) नहीं चला विकास होबे का नारा : भाजपा ने चुनावों में विकास होबे का नारा दिया तो ममता ने खेला होबका। मोदी, शाह ने राज्य में बड़ी-बड़ी रैलियां की और लोगों को भरोसा दिलाया कि अगर राज्य में कमल का
फूल खिला तो यहां विकास की नदियां बहा देंगे। लोगों ने उनकी बात पर भरोसा नहीं किया ममता की पार्टी जीत की हैट्रिक लगाने में सफल रही।
4) बड़े नेताओं की कमी : यूं तो भाजपा ने राज्य में अपने स्टार प्रचारकों की फौज उतार दी थी, लेकिन ये वे नाम
थे जिन्हें देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। ये सितारे भी भीड़ जुटाने में तो सफल रहे पर इसे वोट में नहीं
बदल सके। भाजपा के पास जो भी नेता थे उनमें से अधिकांश तृणमूल कांग्रेस से आए थे। पार्टी को इसका भारी खामियाजा उठाना पड़ा।
5) वोटों का ध्रुवीकरण : भाजपा ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण करने का भी भरसक प्रयास किया। रामकृष्ण मठ से लेकर बंगाल से सभी बड़े मंदिरों में दिग्गज भाजपा नेताओं ने दस्तक दी। ममता की छवि को हिंदू विरोधी बताने का भी प्रयास हुआ्। बहरहाल ममता ने इसकी काट में चंडी पाठ कर दिया। बहरहाल हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण तो हुआ नहीं उलटा ममता ने मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीत लिया।

6) स्थानीय कार्यकर्ताओं की कमी : भाजपा ने पूरे चुनाव अभियान में स्थानीय कार्यकर्ताओं से बाहरी नेताओं और
कार्यकर्ताओं पर भरोसा किया। कई राज्यों से मुख्यंमत्री, मंत्री, विधायक और सांसदों को यहां बुलवाकर जिम्मेदारी दी गई्। पहले टिकट वितरण और फिर चुनाव प्रबंधन में अवहेलना से बंगाल के भाजपा कार्यकर्ता नाराज हो गए्। इसी वजह से अंतिम चार चरणों में पार्टी का चुनाव अभियान बिखरा बिखरा सा नजर आया।

7) मिथुन चक्रवर्ती की अनदेखी : मिथुन चक्रवर्ती के भाजपा में शामिल होने को कुछ लोग बंगाल की राजनीति में गेम चेंजर के रूप में देख रहे थे। चुनावी माहौल में रंगें भाजपा नेताओं ने इस दिग्गज अभिनेता के लिए कोई ठोस रणनीति ही नहीं बनाई्। वे पार्टी में बस शो-पीस बनकर रह गए्। इस अनदेखी ने राज्यभर में मिथुन के फैंस को नाराज कर दिया।

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